पाताल लोक के नीचे 30000 योजन की दूरी पर अनंत नाम से विख्यात भगवान की तामसी नित्य कला है। यह अहंकार रुपा होने से दृष्टा और दृश्य को खींचकर एक कर देती है,इसलिए पांच रात्र आगम के अनुयायी भक्तजन इसे संकर्षण कहते हैं।
जिनकी दृष्टि पढ़ने से ही जगत की उत्पत्ति स्थिति और प्रलय के हेतु भूत सतवादी गुण प्रकृति गन अपने-अपने कार्य में समर्थ होते हैं जिनका स्वरूप ध्रुव अर्थात अनंत और यकृत अर्थात अनाड़ी है तथा जो अकेले होते हुए ही इस धनात्मक प्रपंच को अपने में धारण किए हुए हैं उन भगवान संकरण के तत्व को कोई कैसे जान सकता है।
जिम यह कार्य कारण रूप सारा प्रपंच भाषी रहा है तथा अपने नित जनों का चित्र आकर्षित करने के लिए की हुई जिनकी वीरता पूर्ण लीला को परंपरा आक्रमांक सिंह ने आदर्श मानकर अपनाया है उन उदार वीर्य संरक्षण भगवान ने हम पर बड़ी कृपा करके यह विशुद्ध सत्व मय स्वरूप धारण किया है।
प्रभावशाली भगवान अनंत रसातल के मूल में अपनी ही महिमा में स्थित स्वतंत्र है और संपूर्ण लोगों की स्थिति के लिए लीला से ही पृथ्वी को धारण किए हुए हैं।
